अंतिम मूवी रिव्यू । Antim Movie Review in Hindi

सर्कस वाले झूले पे बैठें हैं कभी आप? मजा भी खूब आया होगा, हवा में गए तो लगा जैसे दुनियाँ के राजा हम – लेकिन ठीक अगले सेकंड जमीन पर नीचे धड़ाम।

बस कुछ ऐसा ही हाल हैं बॉलीवुड के भाईजान सलमान खान का।

वांटेड से लेकर राधे तक इनका कैरियर हवा में उड़ता हुआ सीधा जमीन पर आ गिरा हैं।

लेकिन अब वापस उठकर छलांग मारने का वक्त आ गया हैं।

जी हाँ – चाहें यकीन मानों या ना मानों, ओरिजनल सलमान खान, जिनका एक फैन हम सब के अंदर छुपा हुआ हैं, वो वापस आ गए हैं।

Antim – The Final Truth, ये हैं वो फ़िल्म जिसका इंतज़ार सल्लू भाई के फैन्स को सबसे ज्यादा था।

और बॉलीवुड को इसकी जरूरत ठीक उतनी ही हैं जैसे रेगिस्तान में फँसे किसी प्यासे को पानी की।

बॉस, आप कुछ भी बोलो, लेकिन मास फ़िल्म की असली परिभाषा यहीं हैं।

वो 2-3 घण्टे जो थिएटर में आप बिताते हो, उनमें सारी टेंशन भूल कर आप सिर्फ आँखों के सामने वाली दुनियाँ को एन्जॉय करने लग जाओ।

अभी हाल ही में मैंने जॉन अब्राहम की सत्यमेव जयते 2 देखी, जिसे मास मास चिल्लाकर बेचने की खूब कोशिश की गई, लेकिन नतीजा थिएटर्स खाली।

वहीं अंतिम ने अपना काम एकदम चुपचाप किया हैं, कॉन्टेंट को शोर मचाने की जरूरत नहीं पड़ती, भीड़ वहाँ अपने आप इकट्ठी हो जाती हैं।

Antim – The Final Truth फ़िल्म में लीड कैरेक्टर हैं राहुल दत्ताराम पाटिल जिनका कैरेक्टर प्ले किया हैं आयुष शर्मा ने, जबकि उनका टांका भिड़ा हैं मंदा से जिसका कैरेक्टर महिमा मकवाना ने प्ले किया हैं।

साथ ही, पुलिस ऑफ़िसर राजवीर सिंह का कैरेक्टर प्ले किया हैं सलमान ख़ान ने – वहीं फ़िल्म को डायरेक्ट किया हैं महेश मांजरेकर ने।

जानता हूँ, फ़िल्म का रिव्यू करने में थोड़ा लेट हो गया हूँ लेकिन यक़ीन मानिए, रिव्यू पढ़के मजा आने वाला हैं दोस्त।

Antim Movie Review in Hindi

Antim Movie Story: फ़िल्म की कहानी

Antim फ़िल्म की कहानी महाराष्ट्र के किसान की हैं जो अमीर के पैसों की ताकत के नीचे बुरी तरह कुचला जा रहा हैं।

मेहनत भी करेगा, कुर्बानी भी देगा लेकिन रोटी के साथ पनीर सिर्फ अमीर के घर जाएगा।

बस, इस नाइंसाफी के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाता हैं एक मसीहा, जो गरीबों की आवाज बनकर पूरे महाराष्ट्र के सिस्टम को बहरा करने की तैयार कर रहा हैं।

डॉन, नाम तो सुना होगा, बस उसी स्टाइल में एक के बाद एक ,राहुल भईया अपने दुश्मनों की छुट्टी करके शहर का सबसे ताकतवर इंसान बनने का सफ़र शुरू कर देते हैं।

लेकिन गुंडा चाहे कितना भी बड़ा हो, हर गुंडे का एक बाप होता हैं – पुलिस।

तो यहाँ राहुल के लिए यमराज बनकर प्रकट होते हैं सरदार जी, इनका दिमाग चलता हैं चाचा चौधरी से भी तेज, और हाथ पैर चलाने में तो ये ग्रेट खली को भी एबीसीडी पढा सकतें हैं।

फिर क्या, जंग तो होकर रहेगी, वो भी ऐसी जिसपे पूरे महाराष्ट्र की किस्मत का फ़ैसला लिखा जाएगा।

ये शहर अमीरों का हैं, या फिर गुंडों का – या फिर पूरे गेम का मास्टरमाइंड कोई तीसरा खिलाड़ी हैं।

देखो बॉस, अंतिम एक चालाक फ़िल्म हैं – ये आपके दिमाग से खेलना जानती हैं। जो ऑडिएंस को चाहिए वो एकदम सही जगह पर सही वक्त में बाहर निकल आता हैं।

कहानी जबरदस्त हैं, जिसका पूरा क्रेडिट इसकी ओरिजिनल मराठी फिल्म – मुलशी पेटर्न को जाएगा।

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गैंगस्टर ड्रामा हमनें कई सारे देखें हैं लेकिन किसान के मुद्दे को बीच में रखते हुए एक पॉवरफुल कहानी तैयार करना – जो सिनेमा के पर्दे से बाहर निकलकर असली दुनियाँ के लोगों से कड़वे सवाल पूछती हैं – इसके लिए वाकई कड़ी मेहनत लगती हैं गुरु।

एक्स-फ़ेक्टर हैं फ़िल्म में छोड़ा गया मजेदार कन्फ्यूजन – कौन सही हैं और कौन गलत?

आप किसको हीरो की जगह देखते हो और किसको विलेन की जगह? ये सवाल सुनने में जितना आसान लगता हैं, इसका जवाब ढूँढना उतना ही मुश्किल हैं।

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मुझे पर्सनली डर लग रहा था आयुष शर्मा के लिए, क्योंकि इनकी पहली फ़िल्म कुछ खास परफॉर्म नहीं कर पाई और फिर सीधा इतनी बड़ी फ़िल्म में लीड कैरेक्टर – लेकिन कहना पड़ेगा, लड़का खेल गया।

देखा जाए तो आयुष के कैरेक्टर को इतने दिलचस्प तरीके से लिखा गया हैं की एक्टिंग पर इतना ध्यान जाता ही नहीं हैं।

बीच बीच में कई जगह इनकी परफॉर्मेंस इतनी ढ़ीली हो जाती हैं लेकिन कहानी में आगे क्या होगा? वो जानने के चक्कर में बाकी सारी चीजें नजरअंदाज हो जाती हैं।

और बड़ी चालाकी से आयुष के इर्द-गिर्द टेलेंटेड मराठी एक्टर्स को फ़िल्म में कास्ट किया गया हैं जो फ़िल्म की इंटेंसिटी और इमोशन्स को बनाएं रखते हैं।

ऊपर से फ़िल्म का म्यूजिक इतना जबरदस्त हैं जो फ़िल्म का लेवल नीचे गिरने से पहले उसको बार बार ऊपर उठा देता हैं।

एक्शन सीन्स के बैकग्राउंड में अलग ही लेवल की एनर्जी महसूस होती हैं।

कोई भी फालतू आइटम सॉन्ग्स फ़िल्म में नहीं घुसाए गए हैं और जो गाने हैं फ़िल्म में, वो परिस्थितियों के हिसाब से एकदम फिट बैठते हैं।

बिल्कुल नाप तोल के पार्टी, रोमांस और इमोशन्स का डोज तैयार किया गया हैं।

और अब बात उनकी जो पूरी फिल्म को अपने कंधों पर उठाकर शुरुआत से अंतिम क्लाइमेक्स तक सही सलामत पहुँचा देते हैं – सलमान खान।

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काफ़ी टाइम बाद एक मस्त कैरेक्टर प्ले किया हैं सलमान ने, जिसकी ना तो फ़िजिक्स से कोई दुश्मनी हैं और ना ही ओवर एक्टिंग की बीमारी।

पुलिस ऑफ़िसर के रूप में सलमान काफ़ी जच रहें हैं। एक्शन सीन्स भी बेबुनियादी नहीं हैं – सिर्फ हाथ पैर या बंदूक का इस्तेमाल होता हैं।

इनके द्वारा पुलिस का एक छिपा हुआ नजरिया भी प्रस्तुत किया जाता हैं जिसमें ये पुलिस की ड्यूटी, शहर को बचाना नहीं बल्कि नेताजी को नए नए गुंडे सप्लाई करना बतातें हैं।

अब मुझे नहीं पता, कुछ लोग जबरदस्ती फ़िल्म को क्रिटिसाइज क्यों कर रहें हैं वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि इसमें सलमान खान हैं।

पसन्द नापसंद एक तरफ, लेकिन झूठ तो मत बोलो कम से कम। माना अंतिम कोई फ्रेश, यूनीक कहानी नहीं हैं और कुछ नया देखने को नहीं मिलेगा।

लेकिन फ़िल्म की कहानी बताने का तरीका, वो तो जबरदस्त हैं।

ये टिपिकल बॉलीवुड मसाला फ़िल्म हैं जिसमें एक्शन हैं, सस्पेंस हैं, म्यूजिक हैं और अंत में एक मजेदार ट्विस्ट भी हैं।

Antim Movie Review: रेटिंग्स

तो यार मेरी तरफ से अंतिम को 5 में से 3.5 स्टार्स।

एक स्टार आयुष वर्सेज़ सलमान वाले फेसऑफ़ सीन में डाले गए ख़तरनाक बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए।

एक स्टार, हीरो और विलेन के बीच में फर्क खत्म करने वाली दमदार राइटिंग के लिए, जो सोचने को मजबूर कर देगी।

एक स्टार फ़िल्म की स्मार्ट एंडिंग के लिए, जो सही और गलत, दोनों को चुनने का, अंतिम रिजल्ट क्या निकलता हैं? वो बेहतरीन तरीके से समझा देती हैं।

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और आधा स्टार छोटे छोटे दिलचस्प कैमियो के लिए, जो लीड कास्ट आयुष और सलमान, दोनों के इर्द-गिर्द कहानी को बुनने में पूरी मेहनत करते हैं।

बात करूँ नेगेटिव्ज की, तो एक स्टार कटेगा थोड़े से खींचे हुए सेकंड हाफ़ के लिए, जिसमें फ़िल्म की रफ़्तार धीमी हो जाती हैं और आप बस एंडिंग का बेसब्री से इंतज़ार करने लगते हो।

और आधा स्टार कटेगा कई सीन्स में आयुष की एक्टिंग, जो थोड़ी सी ओवर एक्टिंग में बदल जाती हैं।

वो ओरिजनल फ़िल्म मुलशी पेटर्न के मुकाबले अंतिम को काफ़ी कमजोर बना देती हैं।

अब देखों बॉस, अंतिम फ़ैसला आपका हैं, सलमान खान फैन हो, तो 101 प्रतिशत थिएटर चले जाओ, दिल मे ज़रा सा भी शक मत रखना, सीटियाँ तालियाँ बजाते थक जाओगे।

और वो लोग जो मिला-जुला रिव्यू पढ़के टिकट बुक करने से डर रहें हैं, घबराओं मत थिएटर चले जाओ, वो भी अपने पूरे परिवार के साथ – इस बार पूरा पैसा वसूल हो जाएगा।

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