Mimi Movie Review in Hindi: Release Date, Cast, Story

कॉमेडी और रोमांस, एक ऐसा जॉनर जिसकी फ़िल्में बॉलीवुड में सबसे ज्यादा डिमांड में रहती हैं लेकिन जितना आसान ये सब्जेक्ट दिखता हैं उतना ही मुश्किल हैं इसको फ़िल्म की शक्ल देना।

किसी को हँसा कर रुलाना या फिर रुला कर हँसाना सबसे बड़ा चैलेंज हैं सिनेमा की दुनियाँ का।

एक कॉमेडी फिल्म रिलीज़ हुई हैं नेटफ्लिक्स पर – मिमी।

पहली चीज़, इस फ़िल्म में पंकज त्रिपाठी अहम भूमिका में हैं, दूसरी चीज़ गाँव वाली बैकग्राउंड सेटिंग के साथ एक मिडिल क्लास घर हैं, तीसरी चीज़ हैं मजाकिया one liners के साथ देसी राईटिंग और चौथी सुंदर संस्कारी चेहरा, साथ में सोशल मैसेज वाला कॉन्टेन्ट।

इन चारों चीज़ों का जोड़ हैं मिमी जिसे नेटफ्लिक्स पर 26 जुलाई 2021 को रिलीज़ किया गया था।

फ़िल्म को लक्मण उतेकर ने डायरेक्ट किया हैं जो इससे पहले लुका छुपी जैसी फ़िल्म को डायरेक्ट कर चुके हैं।

जिस फ़िल्म को कपूर, खान जैसे सरनेम्स में ढूँढकर हम थक गए वो आखिर में मिली कृति सेनन के घर के अंदर।

तो फिर करते हैं कृति सेनन की नई फिल्म मिमी का रिव्यू, क्या सही हैं क्या गलत?

Mimi Movie Review in Hindi

Mimi Cast (स्टार कास्ट)

फ़िल्म की लीड़ कैरेक्टर हैं मिमी मान सिंह राठौड़ जो small town dancer हैं और हीरोइन बनने का सपना रखती हैं, इस किरदार को निभा रहीं हैं कृति सेनन जिन्होंने फ़िल्म पानीपत में एक अहम रोल निभाया था।

फ़िल्म का दूसरा सबसे दिलचस्प कैरेक्टर हैं भानु प्रताप पांडे का जिसे निभाया हैं पंकज त्रिपाठी ने।

साई तमानकर ने इस फ़िल्म में शमा का किरदार निभाया हैं जो मिमी की best फ्रेंड हैं।

मिमी के पिताजी हैं मान सिंह राठौड़ जिनका किरदार निभाया हैं मनोज पाहवा ने जबकि मिमी की माँ शोभा राठौड़ का किरदार निभाया हैं सुप्रिया पाठक ने।

Mimi Story (कहानी)

बाला फ़िल्म तो देखी होगी ना आपने, उन्ही मेकर्स की प्रस्तुति हैं मिमी।

बाला में जहाँ एक मिडिल एज बन्दा सोसाइटी के मुद्दों से लड़ता झगड़ता खुद अपने आप से मिल जाता हैं, कॉमेडी और emotions दोनों देखने को मिले थे इस फ़िल्म में।

यहाँ मिमी में फोकस में हैं प्रेग्नेंसी, जी हाँ वो चीज जो औरत को मर्द से अलग बनाती हैं, बच्चे को दुनियाँ में लाने की शक्ति।

लेकिन वैसे नहीं जैसे आप सोच रहें हो, एक छोटा सा ट्विस्ट हैं – सरोगेसी।

माँ बाप अलग हैं लेकिन बच्चा जिसके पेट में रहेगा वो कोई तीसरा इंसान हैं। पंकज त्रिपाठी के शब्दों में बोलूँ तो बीज और खाद किसी ओर के बस मिमी को खेत की जमीन देनी हैं।

लेकिन क्यों? Simple सा जवाब हैं पैसा।

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बस 9 महीने के कुर्बानी, उसके बाद जो पैसा मिलेगा उसे लेकर मिमी मुंबई जाना चाहती हैं, अपने सपनों के शहर क्योंकि उसे हीरोइन बनना हैं बिल्कुल दीपिका और करीना के जैसे।

एक सीधा सा सवाल, मिमी बाकी कॉमेडी फिल्मों से अलग क्यों हैं?

इसका सीधा जवाब हैं, फ़िल्म में वाकई कॉमेडी मिलेगी। वो डबल मीनिंग जोक्स या फिर टिक टोक वीडियोज की तरह बैकग्राउंड में हँसने वाली आवाजें नहीं बल्कि clean और mature humour देखने को मिलेगा।

सबसे बड़ा चैलेंज था एक प्रेग्नेंट औरत को center में रखकर कॉमेडी डॉयलोग्स लिखना।

आप तो जानते ही हो कि आजकल feminism का जमाना हैं, एक दो शब्द इधर उधर हो गए तो लोग हाथ में पोस्टर लेकर रोड पर निकल पड़ेंगे और फ़िल्म हो जाएगी बैन।

लेकिन चालाक बोलूं या समझदार, फ़िल्म के राईटर्स ने बेहद शानदार काम किया हैं।

चुटकुले तो बोले जाते हैं और मिमी उसका हिस्सा भी हैं लेकिन निशाना हमेशा सामने वाला होता हैं, खेल गए राईटर्स साहब।

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और हाँ, ये प्रेग्नेंसी जैसा टॉपिक काफ़ी हद तक किसी भी इंसान को असहज बना सकता हैं, स्पेशली जब वो परिवार के साथ बैठा हो।

बच्चा पैदा करना हैं आपके साथ, ये सुनकर अजीब से ख़याल आएंगे ना किसी के भी दिमाग में लेकिन इस कमजोरी को मिमी ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना ली हैं।

हुआ ये की लीड एक्ट्रेस कृति सैनन का जो कैरेक्टर हैं वो जनरल audience को represent करता हैं। शुरुआत में ये खुद प्रेग्नेंसी का नाम सुनकर मुँह छुपा लेती हैं।

फिर धीरे धीरे ये अपने साथ पूरी audience को भी समझदार बनाना शुरू करती हैं, इनके साथ हम भी प्रेग्नेंसी और बच्चों के बारे में comfortable हो जाते हैं।

लेकिन रुको ज़रा, थोड़ा सब्र करो, इससे पहले की आप इन सबका क्रेडिट बॉलीवुड के नाम कर दो, पहले ज़रा फ़िल्म की कहानी के बारे में तो जान लो।

वास्तव में मिमी की कहानी ओरिजनल नहीं हैं बल्कि एक मराठी फिल्म मला आई कायचय पर आधारित हैं जिसको 2011 में नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका हैं।

मिमी की तारीफ़ जरूर करना, में भी करूँगा लेकिन मराठी सिनेमा को भूलना मत, सच्चा art असली कॉन्टेन्ट।

अब जोर जोर से घूमता हुआ एक सवाल आया होगा आपके दिमाग में की जब फ़िल्म देखनी ही हैं तो मराठी वाली देख लेते हैं, ये मिमी पर अपना वक्त क्यों लगाना?

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इसका जवाब में तीन कारणों में देना चाहूँगा।

पहला, वो मराठी फिल्म पूरी तरह से emotional थी लेकिन मिमी में कॉमेडी का तड़का लगा हुआ हैं और इसका क्रेडिट जाना चाहिए डायरेक्टर साहब को।

असली humour वो होता हैं जिसको ढूँढने के लिए आपको बिल्कुल भी दिमाग ना लगाना पड़े, हँसी आनी हैं तो natural आनी चाहिए।

हंगामा 2 की तरह कुछ भी जोर से तेज आवाज में बोलने की जरूरत नहीं पड़ती।

मिमी में परिस्थितियों को इस तरह से प्रस्तुत किया गया हैं की आप अचानक से जोर से हँस पड़ते हो वो भी बिना किसी sense और लॉजिक की परवाह किये।

डायरेक्शन की तारीफ़ इसलिए भी क्योंकि मिमी एक complete पारिवारिक फ़िल्म हैं, यहाँ में कॉन्टेन्ट की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मेरा इशारा हैं emotions की तरफ़।

शांत feelings जिनको बोलने की जरूरत नहीं पड़ती वो फ़िल्म के हर दूसरे scene में घुसी हुई हैं, आप उनको महसूस भी करोगे और अपनी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ भी पाओगे।

दूसरा कारण ए.आर. रहमान, मिमी का म्यूजिक एकदम हटके हैं लेकिन जबरदस्त हैं।

काफी वक़्त के बाद एक बढ़िया आइटम सॉन्ग देखने को मिला जिसमें डांस, बीट्स और खूबसूरती का ख़तरनाक जोड़।

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बाकी गाने लिरिक्स की पॉवर पर निर्भर करतें हैं, शब्दों का जादू, जिनमें जब ए.आर. रहमान की आवाज घुल जाती हैं तो कानों को शोर शराबा नहीं बल्कि शांति मिल जाती हैं।

तीसरा कारण हैं मिमी की casting, फ़िल्म की स्टार कास्ट ऐसी हैं जैसे मानों शतरंज की हर एक चाल सही जगह पर सोच समझकर पूरी होशियारी से चली गयी हो।

वैसे दो चीजें हैं फ़िल्म में जो आपको थोड़ा खटक सकती हैं।

मतलब आप नजरअंदाज कर तो दोगे लेकिन दिमाग बार बार उनको सामने लाता रहेगा फ़िल्म पर सवाल उठाने के लिए।

पहली बात मिमी की ज़िंदगी बाहर से जितनी मुश्किल दिखती हैं अंदर से उतना कठिन और मुश्किल कुछ भी नहीं दिखाया गया।

माँ बाप, वो पूरी तरह सपोर्ट करते हैं, बेटी ने शादी कर ली, प्रेग्नेंट हो गयी और उम्र से दुगुना पति भी आ गया लेकिन तेज़ आवाज में गुस्से में कहा गया एक डायलॉग भी सुनने को नहीं मिला।

दूसरी चीज़ एक ही शहर में अपने घर वालों से बचकर रहना वो भी तब जब आपके खूबसूरत looks और डांस के लिए हर मोहल्ले में आपका नाम मशहूर हैं, ये बात कुछ हज़म नहीं हुई।

एक छोटी सी सलाह ये की अगर फ़िल्म का ट्रेलर नहीं देखा हैं अभी तक तो बिल्कुल मत देखना वरना पूरी कहानी का जो मजा हैं, वो पहले ही गड़बड़ हो जाएगा।

एक्टिंग और परफॉर्मेंस

पंकज त्रिपाठी, हर scene ऐसा लगता हैं जैसे मानों वो scene इनको सोचकर ही लिखा गया था।

ना कोई मेहनत ना कोई दिखावा। बिना किसी परेशानी में एकदम natural एक्टिंग और ऊपर से इनका किरदार UP की भाषा बोलता हैं तो पंकज त्रिपाठी ने हर गेंद पर छक्का जड़ दिया हैं बॉस।

सपोर्टिंग कैरेक्टर्स भी बहुत स्ट्रॉन्ग हैं इस फ़िल्म के, रोल भले ही छोटा हो लेकिन एक्टर्स सारे बड़े और टैलेंट उससे भी बड़ा।

सुप्रिया पाठक और मनोज पाहवा, दोनों खुद से connection महसूस करने को मजबूर कर देंगे।

ये वो मम्मी पापा हैं जिनके सपने हम बचपन में मम्मी पापा से लड़ाई करके देखा करते थे।

साईं तमानकर, एक underrated एक्ट्रेस हैं लेकिन उम्मीद हैं इस बार उनकी जबरदस्त परफॉर्मेंस लोगों तक जरूर पहुँचेगी।

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कैमरा ज्यादा नहीं रहता इनके ऊपर लेकिन जब ये स्क्रीन पर उपस्थित होंगी तो इनके ऊपर से आँखे हटा नहीं पाओगे आप।

और last में कृति सेनन, अपनी पूरी ताकत लगा दी हैं बंदी ने इस कैरेक्टर में।

सबसे बड़ा complement, एक ही फ़िल्म में आपको इनके अंदर दो अलग अलग इंसान नज़र आएंगे।

एक चुलबुली पागल सी जवानी के नशे में चूर लड़की जिसे जिंदगी को अपने इशारों पर नचाना हैं।

तो दूसरी तरफ़ सोसायटी से आमने सामने से पंगा लेने वाली mature माँ।

बस फ़िल्म में इनका जबरदस्ती राजस्थानी लहजा डाला गया हैं जो गड़बड़ करता हैं। मतलब दो तीन scene तो ये लहजा बरकरार रहता हैं फिर चार पाँच scene के लिए फिर से साधारण हिंदी, राजस्थानी गायब।

जिसकी वजह से कृति के काफ़ी सारे डॉयलोग्स उतने प्रभावशाली नहीं रह पाते जितना उनको डालना चाहिए।

रेटिंग

हाँ तो मेरी तरफ़ से मिमी को 5 में से 4 स्टार्स।

एक स्टार काफ़ी वक्त के बाद fresh और यूनीक कॉन्टेन्ट के लिए जिसको बिना किसी टेंशन के पूरे परिवार के साथ देख सकतें हो।

एक स्टार natural humour से भली हुई चालाक और शानदार राईटिंग के लिए और साथ में बैकग्राउंड में ए.आर. रहमान के जादुई म्यूजिक experience के लिए।

एक स्टार काफ़ी गहराई से लिखे गए कैरेक्टर्स और उनमें cast किये गए परफेक्ट एक्टर्स के लिए, सब के सब याद रह जाएंगे।

एक स्टार काफ़ी सारे सोशल मुद्दे जैसे तीन तलाक, गोरे लोगों से हम लोगों का जुनून और लड़की के कैरेक्टर को परखने की गन्दी आदत, इन सबको हाईलाइट करना लेकिन समझदारी भरें तरीके से बिना किसी controversy के।

बात करूँ नेगेटिव्ज की तो आधा स्टार कटेगा मिमी की struggle को नजरअंदाज करके उसकी जिंदगी को बेहद आसान बनाने के लिए और आधा स्टार वो कृति का राजस्थानी लहजा जो बीच बीच में गायब हो जाता हैं।

साथ ही थोड़े बहुत unrealistic नेरेटिव्ज जैसे घर वालो से छुपना वो भी उसी शहर में, उन सबके लिए।

बाकी अगर कुछ शेयर करना हो अपने दिल की बात तो नीचे कॉमेंट्स में लिखना मत भूलना, में मिलता हूँ आपसे किसी ओर रिव्यू में तब तक के लिए – जय हिंद।

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