Sardar Udham Movie Review in Hindi

इतिहास की किताबों में कई सारी तारीखें लिखी होती हैं कभी कुछ तो कभी कुछ। हम अक्सर उनको पढ़कर भूल जाते हैं।

लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में उसका निशान कितना गहरा हो सकता हैं? ये हमनें शायद ही कभी सोचा हो।

वैसे ही 13 अप्रैल 1919 के आगे मोटे मोटे शब्दों में लिखा हैं जलियांवाला बाग हत्याकांड

स्कूल में हमनें अक्सर इसके बारे में कई बार पढा भी हैं, टीचर्स के मुँह से कई बार सुना भी हैं और कहीं एग्जाम में सवाल ना आ जाए, इस चक्कर में याद भी किया हैं।

लेकिन आज बारी हैं उसको अनुभव करने की, अपनी आँखों से देखने की।

सरदार उद्दम अमेज़ॉन प्राइम पर रिलीज़ हो चुकी हैं। एक ऐसी फ़िल्म जो किसी भी तरह से साधारण तो बिल्कुल नहीं हैं।

फ़िल्म बनाने से लेकर फ़िल्म देखने वाला इंसान, दोनों के दिमाग में एक चीज होना बहुत जरूरी हैं, फ़ीलिंग्स

लेकिन साफ साफ शब्दों में में पहले ही बता दूँ की ये फ़िल्म हर तरह के audience के लिए बिल्कुल नहीं हैं, तसल्ली चाहिए, वक्त लगता हैं इस तरह के सिनेमा को अपने अंदर उतारने में।

फटाफट, झटपट मनोरंजन यहाँ नहीं मिलने वाला, साथ ही हिंसा और खून खराबा next level पर हैं मेरे दोस्त। कुछ scenes हैं जो आपको काफ़ी परेशान कर सकतें हैं।

यहाँ तक कि आँखे बंद करने के बाद भी वो आपका पीछा नहीं छोड़ेंगे, तो सोच समझकर फ़िल्म देखने का फैसला करना।

सरदार उद्दम की कहानी जानने से पहले चलिए उन लोगों से मेल मिलाप हो जाए जिन्होंने इस शानदार फ़िल्म में अभिनय करके इसे हमारे दिलों में forever memory की तरह बैठा दिया हैं।

Sardar Udham Movie Review in Hindi

Sardar Udham Cast (स्टार कास्ट)

सरदार उद्दम फ़िल्म में लीड कैरेक्टर प्ले कर रहें हैं विक्की कौशल जो शेर उद्दम सिंह उर्फ़ राम मोहम्मद सिंह आज़ाद का किरदार निभा रहें हैं।

अमोल पाराशर ने भगत सिंह और बनिता संधू ने रेशमा का किरदार प्ले किया हैं।

वहीं इस फ़िल्म में कई अंग्रेजों के किरदार भी हैं जिनमें माइकल ओ’डायर का किरदार निभाया हैं शॉन स्कॉट ने जबकि डिटेक्टिव इंस्पेक्टर स्वैन का किरदार स्टीफ़न होगन ने प्ले हैं।

Sardar Udham Story (कहानी)

Sardar Udham फ़िल्म की कहानी एक teenage लड़के की हैं जो कुछ भी ज्यादा सोचे समझें बिना अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रहा हैं।

साथ में एक दोस्त हैं जिसके साथ भविष्य बनाने के बड़े बड़े सपने भी चल रहें हैं दिमाग में। लेकिन एक शब्द हैं जिसके लिए उसके भविष्य में कोई जगह नहीं हैं – गुलामी वो भी अंग्रेजों की

किसी ओर की शर्तों पर साँसे लेना। कब तक चले कब रुक जाए कोई भरोसा नहीं।

इस चीज को बदलने की आग इसके दिमाग में जल चुकी हैं और इस आग को धमाके में बदलने का काम करता हैं 13 अप्रैल 1919 का वो खून जैसा लाल दिन।

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जब पंजाब के अमृतसर में कितने लोग मारे गए, उसकी सटीक गणना आज 100 सालों के बाद भी कोई नहीं कर पाया।

जिधर देखों उधर सिर्फ लाशें ही लाशें हैं। किसी का हाथ गायब हैं तो किसी का पैर तो किसी का सिर शरीर से अलग पड़ा हुआ हैं।

और इस मौत के बीच खड़ा हैं 14-15 साल का एक लड़का, उस दिन जन्म होता हैं सरदार उद्दम का, वो बन्दा जो हिंदुस्तान का बदला लेने सीधे अंग्रेजों की जमीन लंदन में कदम रख देता हैं।

और दिन की रोशनी में पुलिस के आँखों के सामने उस बड़े ऑफ़िसर को गोलियों से भून डालता हैं जिसने जलियांवाला बाग में हजारों लोगों को बिना किसी गलती के सिर्फ अपने शौक के लिए मरवा डाला था।

लेकिन यहाँ फ़िल्म ख़त्म नहीं बल्कि शुरू होती हैं। शेरसिंह आखिर सरदार उद्दम सिंह बना कैसे? सालों की मेहनत उस नामुमकिन से बदले को पूरा करने में।

जिसने सोते हुए हिंदुस्तान को नींद से जगाके आज़ादी का सपना दिखा दिया, वो एक एक कदम कहानी की शक्ल में हमारे सामने रख दी जाती हैं।

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फ़िल्म सरदार उद्दम का एक दूसरा भाग भी हैं जिसमें सरदार उद्दम और भगत सिंह के सीक्रेट relationship को दिखाया जाता हैं।

और दोनों ने जो भविष्य में किया वो क्यों किया और इतनी हिम्मत आई कैसे? ऐसे ही सवालों के जवाब हमें इस फ़िल्म में मिलते हैं।

देखो बॉस, सीधी simple बात हैं कि फ़िल्म बनाने में और बेचने में बहुत फ़र्क होता हैं और अक्सर बॉलीवुड को हम फिल्म बेचते हुए ही पाते हैं।

लेकिन शुजीत सरकार सरदार उद्दम के साथ सिनेमा के साथ जरा भी समझौता करने को तैयार नहीं हैं।

क्लाइमेक्स का एक scene हैं जो पूरे 20-25 मिनट तक चलता हैं वो भी बिना किसी ब्रेक के, वो चीज सिर्फ 2 मिनट में बोलकर भी बताई जा सकती थी लेकिन डायरेक्टर उसका एक एक पल हम audience के सामने रखते हैं।

क्योंकि वो चाहते हैं कि आप और हम उस scene को सिर्फ देखने के बजाय उसे जीने लग जाएं

सरदार उद्दम फ़िल्म को इतनी ज्यादा डिटेलिंग के साथ बनाया गया हैं कि जब ढाई घण्टे के बाद टीवी बन्द होता हैं तो आप घर के कमरें में नहीं बल्कि जलियांवाला बाग के बीचों बीच जा खड़े होते हो।

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अक्सर फिल्मों में अंग्रेजी ऑफ़िसर टूटी फूटी बिना सिर पैर वाली हिंदी में बातें करते हैं, जहाँ लॉजिक ये होता हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी बातें समझ जाएं, भले ही वो गलत हो या बेफकूफ क्यों ना दिख रहें हो।

लेकिन शुजीत सरकार इसमें भी समझौता करने के मूड में नहीं हैं। फ़िल्म में लंदन वाले भाग को एकदम वास्तविक और विश्वसनीय बनाया गया हैं।

पूरी बातचीत को english में रखा गया हैं भले ही लोगों को समझने में दिक्कत होगी लेकिन वो अनुभव वास्तविक होगा बनावटी नहीं।

Sardar Udham फ़िल्म की राईटिंग में तो अलग ही लेवल का खेल चल रहा हैं बॉस।

कोई जिंदा हैं जिंदा हैं कोई, इस एक लाइन ने इतना असर छोड़ दिया हैं मेरे ऊपर जितना बॉलीवुड की 3 घण्टे की पूरी फ़िल्म भी नहीं छोड़ पाती।

Script को एकदम बुद्धिमानी से लिखा गया हैं, बिना किसी वक्त की बर्बादी के सीधा screen पर धड़ाधड़ डॉयलोग्स पे डॉयलोग्स आते हैं जैसे कोई गोलियां चला रहा हो आपके कान पर।

इतना ज्यादा जोश, इतना ज्यादा emotions, डर, पागलपन, बदला, खुशी, प्यार, दोस्ती हर एक फील्ड में इस फ़िल्म की लिखावट काबिल-ए-तारीफ़ हैं बॉस।

यहाँ तक कि अगर इसके negetive side की बात करें तो अंग्रेज ऑफ़िसर्स के डॉयलोग्स, वो भी उन लोगों से नफ़रत करने पर मजबूर कर देंगे। एक एक शब्द सोच समझकर लिखा गया हैं।

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सरदार उद्दम के sets को इतनी बारीकी से design किया गया हैं की इतिहास को अतीत से वर्तमान में खींचकर लाने वाला असम्भव सा मिशन भी सम्भव हो जाता हैं।

बैकग्राउंड म्यूजिक, ये फ़िल्म की उस रीढ़ की हड्डी की तरह हैं जो हर एक scene को ओर ज्यादा intense और गहरा बना देता हैं, डरावना और सुंदर, एक साथ एक समय में।

और एक तारीफ़ उनकी भी जो ऊपर लिखी गयी हर एक चीज को एकदम परफेक्ट तरीके से जोड़कर हम audience के सामने सिनेमेटिक मास्टरपीस की तरह रख देते हैं – सरदार उद्दम के डायरेक्टर शुजीत सरकार

देखो दोस्त, बहुत मुश्किल होता हैं जब आपको एक ही फ़िल्म में तीन चार कहानियाँ एक साथ सुनानी पड़े।

चलो सुना तो फिर भी दोगे लेकिन उसको बिना किसी confusion के एकदम स्पष्टता से दिखाना बहुत टेढ़ा काम हैं।

यहाँ भी स्टोरी अतीत और वर्तमान में backward forward चलती रहती हैं लेकिन फ़िल्म का फ्लो जरा भी गड़बड़ नहीं होता।

हर एक scene को एक छोटी सी back story से परिचय करवाया जाता हैं और फिर बाद में पूरा visual आँखों के सामने प्रस्तुत होता हैं।

इससे होता ये हैं कि हम आसानी से वापस वर्तमान में लौट आते हैं बिना किसी असमंजस के।

और फ़िल्म के अंत में क्लाइमेक्स तो सब कुछ बिल्कुल बदलकर ही रख देता हैं, आधा घण्टा रौंगटे सिर्फ खड़े ही नहीं होंगे बल्कि ठहर ही जाएंगे।

उस दर्द को सिनेमा की screen तोड़कर महसूस कर पाना एक अलग ही लेवल का जादू हैं। इसमें सबकी मेहनत लगती हैं। यहाँ वो अकेला हीरो का स्वेग वाला कोई चक्कर नहीं हैं।

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सरदार उद्दम बिना किसी शक या गलती के भारत की one of the most complet फ़िल्म हैं।

हर एक scene वास्तविक हैं साथ में विक्की कौशल की outstanding परफॉर्मेंस। हाँ लेकिन कहानी बताने का तरीका थोड़ा धीमा हैं, वक्त लगता हैं फ़िल्म को धीरे धीरे फैलने में। सब्र चाहिए बॉस, इसे महसूस करने के लिए।

एकदम screen on होते ही नाच गाना, एक्शन scenes, ये सब उम्मीद मत लगा बैठना वरना पूरे ढाई घण्टे बोर हो जाओगे।

ये आपके मतलब की फ़िल्म हैं ही नहीं। इसमें गलत कुछ नहीं हैं, सबका taste अलग अलग होता हैं।

एक्टिंग और परफॉर्मेंस

क्या आपको पता हैं? सरदार उद्दम फ़िल्म में दिग्गज अभिनेता इरफ़ान खान को cast करने की प्लानिंग थी लेकिन वो हो नहीं पाया।

लेकिन सच सच बताऊँ तो इरफ़ान साहब आज जहाँ भी होंगे उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान होगी, विक्की कौशल को देखकर।

विक्की कौशल, ये बन्दा असल मायने में साबित करता हैं की हीरो बनने में और real एक्टिंग करने में जमीन आसमान का फ़र्क होता हैं।

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मतलब आज से पहले जिसनें सरदार उद्दम को नहीं देखा उनके लिए विक्की का चेहरा ही सरदार उद्दम बन जायेगा, इस बात की गारंटी में दे सकता हूँ।

एक एक scene में जादू किया हैं इस बन्दे ने। विक्की कौशल ने इस कैरेक्टर को प्ले ही नहीं किया हैं बल्कि उसे जिंदा किया हैं

बोलने का तरीका, चलने का ढंग, यहाँ तक कि आँखों ही आँखों में बातें करना। अब जाके समझ आया कि आज तक हम जिस चीज को एक्टिंग बोलते थे वो सिर्फ नाटक था भईया।

विक्की अगर हॉलीवुड में ये कैरेक्टर प्ले करते तो हाथ में ऑस्कर वाली ट्रॉफी 100 प्रतिशत पक्की थी वो भी बिना किसी शक के।

रेटिंग

तो यार मेरी तरफ़ से Sardar Udham फ़िल्म को 5 में से 5 स्टार्स मिलेंगे।

अब देखों, गलतियाँ ढूँढने वाले तो गलतियाँ निकाल ही देंगे, अब वहीं उनका काम जो ठहरा।

हम फ़िल्म को सिर्फ फ़िल्म की तरह ही नहीं देखते, सिनेमा लवर होने के नाते हमारे लिए वो एक जिंदगी हैं जिसको जीने में मजा आना चाहिए बस।

तो भईया, एक स्टार शुजीत सरकार के नाम जिन्होंने एक मुश्किल फ़िल्म को बिल्कुल आसान और प्रभावशाली तरीक़े से प्रस्तुत किया हैं।

एक स्टार फ़िल्म की सटीक set desiging और कभी ना भूल पाने वाले क्लाइमेक्स scene की डरावनी सिनेमेटोग्राफी के लिए।

एक स्टार विक्की कौशल की अब तक कि सबसे best और वास्तविक एक्टिंग परफॉर्मेंस के नाम। में तो इस बन्दे का फैन तब ही हो गया था जब उरी फ़िल्म देखी थी, लेकिन इस फ़िल्म में कमाल कर दिया जनाब ने।

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सच में इरफान खान साहब को इससे बेहतरीन ट्रिब्यूट कोई और नहीं दे सकता।

एक स्टार फ़िल्म के अनुभव को strong और bold बनाने वाली राईटिंग के लिए। एक एक डायलॉग एकदम आग की तरह गरमा गरम हैं और मतलब का भी हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी तीनों में।

और last एक स्टार जलियांवाला बाग हत्याकांड की हिंसा को recreate करने की हिम्मत दिखाने के लिए।

मुझे पता हैं controversies तो होंगी ही सरदार उद्दम फ़िल्म को लेकर, सवाल भी उठेंगे लेकिन मेकर्स बिना डरे अपना काम कर गए हैं।

सिनेमा को सिनेमा ही रहने दो आज़ादी इधर भी होनी चाहिए।

आप देखो Sardar Udham अमेज़ॉन प्राइम पर, में मिलता हूँ आपसे किसी ओर रिव्यू में तब तक के लिए – जय हिंद।

इस हफ़्ते ओर क्या देखें?

Garuda Gamana Vrishabha Vahana – केजीएफ जैसी फ़िल्म को टक्कर देने वाली फिल्म देखने का मन हो तो इस कन्नड़ फ़िल्म गरुडा गमना वृषभा वहना फ़िल्म को देखना, कसम से मजा आ जायेगा मेरे दोस्त।

Murder At Teesri Manzil 302 – Zee5 पर रिलीज़ हुई इरफ़ान खान साहब की आख़िरी रिलीज़ फ़िल्म को भी इस हफ़्ते देखा जा सकता हैं, ओटीटी पर हैं तो बाहर जाने का झन्झट भी नहीं हैं।

Minnal Murali – भारत के अपने सुपरहीरो की मूवी देखी या नहीं अभी तक? अगर नहीं देखी तो सरदार उद्दम को देखने के बाद सबसे पहले इसी को देखना, watchlist में सबसे ऊपर डालो इसको।

83 – ये फ़िल्म कमाई के मामले में बेहतरीन हो या ना हो लेकिन emotions और परफॉर्मेंस के मामले में बेहतरीन हैं। इसके बारे में ज्यादा बताने की जरूरत नहीं, आप सब जानते हो।

Spider Man No Way Home – एक हॉलीवुड की फ़िल्म भी देख ली जाए इस हफ़्ते। स्पाइडर मैन के फैन्स के लिए एक तोहफ़ा हैं ये फ़िल्म। इसे भी इस हफ़्ते की watchlist में जरूर शामिल करो।

इनमें से कितनी फ़िल्में आप देख चुके हैं? नीचे कॉमेंट्स में जरूर बताएं।

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